RO/ARO History of India & Indian National Movement: Complete Notes & Practice Questions in Hindi
भारत का इतिहास और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन
परिचय (Introduction)
भारत का इतिहास अत्यंत प्राचीन, समृद्ध और वैविध्यपूर्ण रहा है। प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता और वैदिक काल से लेकर महान साम्राज्यों—जैसे मौर्य, गुप्त, और मुगल काल—तक भारत आर्थिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध रहा। हालांकि, 18वीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन और तत्पश्चात ब्रिटिश क्राउन के प्रत्यक्ष शासन ने भारत के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ताने-बाने को पूरी तरह बदल दिया।
ब्रिटिश हुकूमत के आर्थिक शोषण, भेदभावपूर्ण नीतियों और दमनकारी कानूनों ने भारतीय जनता में असंतोष की ज्वाला भड़काई। इसी असंतोष ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (Indian National Movement) को जन्म दिया, जिसने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर 1947 में देश को आज़ादी दिलाने तक एक अभूतपूर्व जन-क्रांति का रूप धारण कर लिया।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का इतिहास और मुख्य चरण
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को सुविधा और विचारधारा के आधार पर मुख्य रूप से तीन प्रमुख चरणों में विभाजित किया जा सकता है:
1. 1857 का महासंग्राम और शुरुआती नींव
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1857 का विद्रोह: इसे ‘भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’ माना जाता है। भले ही ब्रिटिश सरकार ने इसे सैनिक विद्रोह कहकर दबा दिया, लेकिन इसने भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना का बीजारोपण कर दिया।
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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की स्थापना (1885): ए. ओ. ह्यूम (A. O. Hume) के सहयोग से 1885 में कांग्रेस की स्थापना हुई। यह भारत का पहला अखिल भारतीय राजनीतिक मंच बना।
2. उदारवादी चरण (1885 – 1905)
इस दौर के नेताओं में दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले और व्योमेश चंद्र बनर्जी प्रमुख थे।
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रणनीति: प्रार्थना-पत्र, याचिकाओं और संवैधानिक तरीकों से ब्रिटिश सरकार के समक्ष अपनी मांगें रखना।
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लक्ष्य: प्रशासनिक सुधार, विधायी परिषदों का विस्तार और करों में कटौती।
3. उग्रवादी/गरमपंथी चरण (1905 – 1919)
ब्रिटिश सरकार की उपेक्षा और बंगाल विभाजन (1905) के विरोध में गरमपंथी विचारधारा का उदय हुआ।
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प्रमुख नेता: बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, और बिपिन चंद्र पाल (‘लाल-बाल-पाल’)।
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प्रमुख आंदोलन: स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन (1905)। तिलक ने नारा दिया—“स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा।”
4. गांधीवादी युग (1919 – 1947)
1915 में महात्मा गांधी के भारत लौटने और 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद स्वतंत्रता संग्राम अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच गया।
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असहयोग आंदोलन (1920–1922): विदेशी वस्तुओं, सरकारी स्कूलों और उपाधियों का पूर्ण बहिष्कार। चौरी-चौरा कांड के बाद गांधी जी ने इसे वापस लिया।
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सविनय अवज्ञा आंदोलन और दांडी मार्च (1930): नमक सत्याग्रह के साथ देशव्यापी अवज्ञा की शुरुआत हुई।
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भारत छोड़ो आंदोलन (1942): ‘करो या मरो’ (Do or Die) के नारे के साथ यह ब्रिटिश शासन के खिलाफ अंतिम और सबसे बड़ा जन-आंदोलन बना।
5. क्रांतिकारी और सैन्य योगदान
भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ और नेताजी सुभाष चंद्र बोस (आज़ाद हिंद फ़ौज) ने सशस्त्र क्रांति और साहस के बल पर ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी।
अंततः, वर्षों के बलिदान, जन-आंदोलनों और वैश्विक परिस्थितियों के कारण 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ।
महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर और व्याख्या (Q&A with Detailed Explanations)
प्रश्न 1: 1857 के विद्रोह को ‘भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर:1857 का विद्रोह पहला ऐसा संगठित प्रयास था जिसमें सैनिक, किसान, ज़मींदार, स्थानीय राजा और आम जनता एकजुट होकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन को समाप्त करने के उद्देश्य से लड़े।
व्याख्या: हालांकि इससे पूर्व भी कई क्षेत्रीय विद्रोह हुए, लेकिन 1857 के संग्राम का विस्तार उत्तर और मध्य भारत के एक बड़े हिस्से में था। रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहब, कुंवर सिंह और बहादुर शाह ज़फ़र जैसे नेताओं ने एक साझा शत्रु (अंग्रेज़ों) के खिलाफ लड़ाई लड़ी, जिसने पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्रता की भावना जगाई।
प्रश्न 2: 1905 का स्वदेशी आंदोलन क्यों शुरू हुआ और इसका क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत वायसराय लॉर्ड कर्जन द्वारा किए गए बंगाल विभाजन (1905) के विरोध में हुई थी।
व्याख्या: अंग्रेजों की मंशा हिंदू और मुस्लिम आबादी के बीच दरार पैदा करने की थी। इसके जवाब में भारतीयों ने स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग और विदेशी सामानों (कपड़े, नमक, चीनी आदि) के बहिष्कार का फैसला किया। इसने भारत में कुटीर उद्योगों और राष्ट्रीय शिक्षा संस्थानों को बढ़ावा दिया और राष्ट्रीय आंदोलन को एक नया आर्थिक व राजनीतिक हथियार दिया।
प्रश्न 3: महात्मा गांधी के ‘सत्याग्रह’ की मुख्य अवधारणा क्या थी?
उत्तर:‘सत्याग्रह’ का अर्थ है सत्य के प्रति आग्रह। यह अहिंसक प्रतिरोध (Non-violent Resistance) का एक साधन था।
व्याख्या: गांधी जी का मानना था कि अन्याय के खिलाफ संघर्ष करने के लिए हिंसा या शारीरिक बल की आवश्यकता नहीं है। नैतिक बल, आत्म-समर्पण, असहयोग और सविनय अवज्ञा द्वारा अत्याचारी के विवेक को जगाकर उसे सत्य स्वीकार करने पर मजबूर किया जा सकता है। सत्याग्रह का सफल प्रयोग भारत में चंपारण (1917), खेड़ा (1918) और दांडी मार्च (1930) में देखा गया।
प्रश्न 4: ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ (Quit India Movement) की क्या पृष्ठभूमि थी?
उत्तर: यह आंदोलन 8 अगस्त 1942 को बॉम्बे के गवालिया टैंक मैदान से महात्मा गांधी द्वारा शुरू किया गया था।
व्याख्या: द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान क्रिप्स मिशन की विफलता और जापानी आक्रमण के खतरे के बीच कांग्रेस ने यह निर्णय लिया कि अंग्रेजों को तुरंत भारत छोड़ देना चाहिए। गांधी जी ने “करो या मरो” का नारा दिया। शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी के बावजूद यह आंदोलन स्वतःस्फूर्त जन-क्रांति में बदल गया, जिसने अंग्रेजों को यह स्पष्ट कर दिया कि अब वे भारत पर लंबे समय तक शासन नहीं कर सकते।
प्रश्न 5: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस’ का क्या योगदान रहा?
उत्तर: नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से भारत की आज़ादी का मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने ‘आज़ाद हिंद फ़ौज’ (INA) का नेतृत्व किया।
व्याख्या: नेताजी का मानना था कि केवल अहिंसा और वार्ता के बल पर अंग्रेजों से स्वतंत्रता प्राप्त नहीं की जा सकती। उन्होंने विदेशों (सिंगापुर, जापान) में भारतीय सैनिकों को संगठित किया और “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” तथा “दिल्ली चलो” का नारा दिया। आज़ाद हिंद फ़ौज के अभियानों और बाद में INA के अधिकारियों पर चले लाल किले के मुकदमे ने ब्रिटिश भारतीय सेना में विद्रोह की भावना जगा दी, जिससे अंग्रेजों की पकड़ कमजोर हो गई।
निष्कर्ष (Conclusion)
भारत का राष्ट्रीय आंदोलन केवल सत्ता परिवर्तन का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह सामाजिक सुधार, आर्थिक संप्रभुता और लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना का एक महायज्ञ था। विभिन्न धाराओं—उदारवादी, गरमपंथी, गांधीवादी और क्रांतिकारी—के साझा प्रयासों ने ही भारत को स्वतंत्रता के मुकाम तक पहुंचाया।
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